Monday, 6 November 2017

चर्चा विराम का नुस्खा : अधजल गगरी छलकत जाय

लेखक कुलवंत हैप्पी

यह कहावत तब बहुत काम लगती है, जब खुद को ज्ञानी और दूसरे को मूर्ख साबित करना चाहते हों। अगर आप चर्चा करते हुए थक जाएं तो इस कहावत को बोलकर चर्चा समाप्त भी कर सकते हैं मेरी मकान मालकिन की तरह। जी हाँ, मेरी जब जब भी मेरी मकान मालकिन के साथ किसी मुद्दे पर चर्चा होती है तो वे अक्सर इस कहावत को बोलकर चर्चा को विराम दे देती है। इसलिए अक्सर मैं भी चर्चा से बचता हूँ, खासकर उसके साथ तो चर्चा करने से, क्योंकि वो चर्चा को बहस बना देती है, और आखिर में उक्त कहावत का इस्तेमाल कर चर्चा को समाप्त करने पर मजबूर कर देती है। मुझे लगता है कि चर्चा और बहस में उतना ही फर्क है, जितना जल और पानी में या फिर आईस और स्नो में।

कभी किसी ने सोचा है कि सामने वाला अधजल गगरी है, हम कैसे फैसला कर सकते हैं? क्या पता हम ही अधजल गगरी हों? मुझे तो अधजल गगरी में भी कोई बुराई नजर नहीं आती। कुछ लोगों की फिदरत होती है, हमेशा सिक्के के एक पहलू को देखने की। कभी किसी ने विचार किया है कि अधजल गगरी छलकती है तो सारा दोष उसका नहीं होता, कुछ दोष तो हमारे चलने में भी होगा। मुझे याद है, जब खेतों में पानी वाला घड़ा उठाते थे, तो वहाँ भरा हुआ भी छलकता था, और अध भरा  भी छलकता था, क्योंकि खेतों में जमीं समतल नहीं होती, जब जमीं समतल नहीं होगी, तो हमारे पाँव भी सही से जमीं पर नहीं टिक पाएंगे।

अधजल गगरी से याद आया, हमारे गाँव में लाजो-ताजो नामक दो बहनें रहती थी, वो पानी भरने के लिए गाँव से बाहर कुएं पर जाती थी, दूसरी महिलाओं की तरह। तब तो गाँव के रास्ते भी कच्चे थे, स्वाभिक था ऐसे में पाँव पर मिट्टी का पाऊडर लगना। ताजो का घड़ा बिल्कुल नया था, जबकि लाजो के घड़े के ऊपर वाले हिस्से में छोटा सा सुराख था, इसलिए वो हमेशा अपने घड़े को अधभरा रखती। जब वो घड़ा लेकर चलती तो पानी घड़े के भीतर छलकता, ऐसे में कुछ पानी जमीं पर गिर जाता और कुछ उसके जिस्म पर, जो उसके जिस्म को ठंड पहुंचाता। ताजो का घड़ा, लाजो के सुराख वाले घड़े को देखकर अक्सर सोचता, एक तो मुझसे आधा पानी लाता है, ऊपर से लाजो को भिगोता है, फिर भी मुझसे ज्यादा लाजो इसकी तरफ ज्यादा ध्यान देती है। कुछ समय बाद सुराख वाला घड़ा टूट गया, उसके टूटने पर लाजो को वैसा ही सदमा पहुंचा, जैसा किसी अपने के चले जाने पर पहुंचता है। रोती हुई लाजो को दूसरे घड़े ने सवाल किया कि तुम इसके लिए क्यों रो रही हो, ये घड़ा तो अक्सर तुम्हें भिगोता था, और पानी भी मुझसे आधा लाता था। तो लाजो ने कहा, "तुम्हें याद है, जब तुम हमारे घर नए नए आए थे"। घड़ा बोला," हाँ, मुझे याद है"। लाजो ने कहा, "तुमने देखा था तब उस रास्ते को जहाँ से हम रोज गुजरते हैं'। घड़ा ने कहा, 'हाँ', तब वो बिल्कुल घास रहित था"। घास रहित शब्द सुनते ही लाजो ने कहा, "अगर उस रास्ते पर घास उग आई है, तो सिर्फ और सिर्फ इस सुराख वाले घड़े के कारण, अगर ये घड़ा छलकता न, तो कभी भी उस रास्ते पर आज सी हरियाली न आती"। इतना सुनते ही दूसरा घड़ा चुप हो गया।

जरूरी नहीं कि श्री गुरू ग्रंथ साहिब, बाईबल, गीता और कुरान का तोता रटन करने वाला ज्ञानी हो, ऐसा भी तो हो सकता है कि कोई व्यक्ति इन सब धार्मिक ग्रंथों की अच्छी अच्छी बातें ग्रहण कर, अच्छी तरह से अपने जीवन में उतार ले। इस मतलब यह तो न होगा कि सामने वाले के पास अल्प ज्ञान है, सिर्फ इस आधार पर कि उसको पूरे ग्रंथ याद नहीं। मुझे लगता है, जितना उसके पास है, वो उसके लिए काफी है, क्योंकि वो तोता रटन करने की बजाय, उसको समझकर जीवन में उतरा रहा है, जो लोग तोता रटन पर जोर देते हैं, वो धार्मिक होकर भी ताजो के भरे हुए घड़े की तरह किसी दूसरे का फायदा नहीं कर सकते, और ताजो की घड़े की तरह अधजल वाले लाजो के घड़े से ईष्या करते रहते हैं। ग्रंथों में ईष्या को त्यागने के बारे में सिखाया गया है, लेकिन तोता रटन करने वाला क्या जाने इस ज्ञान को।

Sunday, 5 November 2017

राम-राम

जान तेरी, जीवन भी तैरा,
सबकुछ तेरा, कुछ नहीं मेरा
मोहे सौगन्ध मेरे राम की।।

Tuesday, 5 September 2017

भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार

भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े तथ्‍य इस प्रकार हैं:

1. इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है.
2. इसका वर्णन संविधान के भाग-3 में (अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35) है.
3. इसमें संशोधन हो सकता है और राष्ट्रीय आपात के दौरान (अनुच्छेद 352) जीवन एवं व्यकितिगत स्वतंत्रता के अधिकार को छोड़कर अन्य मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है.
4. मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, लेकिन 44वें संविधान संशोधन (1979 ई०) के द्वारा संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31 से अनुच्छेद 19f) को मौलिक अधिकार की सूची से  हटाकर इसे संविधान के अनुच्छेद 300 (a) के अन्तगर्त क़ानूनी अधिकार के रूप में रखा गया है.

भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित मूल अधिकार प्राप्त हैं:
1. समता या समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18)
2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)
5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30)
6. संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 32)

1. समता या समानता का अधिकार:
अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता- इसका अर्थ यह है कि राज्य सही व्यक्तियों के लिए एक समान कानून बनाएगा तथा उन पर एक समान ढंग से उन्‍हें लागू करेगा.
अनुच्छेद 15: धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेद-भाव का निषेद- राज्य के द्वारा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग एवं जन्म-स्थान आदि के आधार पर नागरिकों के प्रति जीवन के किसी भी क्षेत्र में भेदभाव नहीं किया जाएगा.
अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता- राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी. अपवाद- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग.
अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत- अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए इससे दंडनीय अपराध घोषित किया गया है.
अनुच्छेद 18: उपाधियों का अंत- सेना या विधा संबंधी सम्मान के सिवाए अन्य कोई भी उपाधि राज्य द्वारा प्रदान नहीं की जाएगी. भारत का कोई नागरिक किसी अन्य देश से बिना  राष्ट्रपति की आज्ञा के कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता है.

2. स्वतंत्रता का अधिकार:
अनुच्छेद 19- मूल संविधान में 7 तरह की स्वतंत्रता का उल्लेख था, अब सिर्फ 6 हैं:
19 (a) बोलने की स्वतंत्रता.
19 (b) शांतिपूर्वक बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता.
19 (c) संघ बनाने की स्वतंत्रता.
19 (d) देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता.
19 (e) देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता. (अपवाद जम्मू-कश्मीर)
19 (f) संपत्ति का अधिकार.
19 (g) कोई भी व्यापार एवं जीविका चलाने की स्वतंत्रता.
नोट: प्रेस की स्वतंत्रता का वर्णन अनुच्छेद 19 (a) में ही है.
अनुच्छेद 20- अपराधों के लिए दोष-सिद्धि के संबंध में संरक्षण- इसके तहत तीन प्रकार की स्वतंत्रता का वर्णन है:
(a) किसी भी व्यक्ति को एक अपराध के लिए सिर्फ एक बार सजा मिलेगी.
(b) अपराध करने के समय जो कानून है इसी के तहत सजा मिलेगी न कि पहले और और बाद में बनने वाले कानून के तहत.
(c) किसी भी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध न्यायालय में गवाही देने के लिय बाध्य नहीं किया जाएगा.
अनुच्छेद 21- प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का सरंक्षण: किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रकिया के अतिरिक्त उसके जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है.
अनुच्छेद 21(क) राज्य 6 से 14 वर्ष के आयु के समस्त बच्चों को ऐसे ढंग से जैसा कि राज्य, विधि द्वारा अवधारित करें, निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगा. (86वां संशोधन 2002 के द्वारा).
अनुच्छेद 22- कुछ दशाओं में गिरफ़्तारी और निरोध में संरक्षण: अगर किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से हिरासत में ले लिया गया हो, तो उसे तीन प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान की गई है:
(1) हिरासत में लेने का कारण बताना होगा.
(2) 24 घंटे के अंदर (आने जाने के समय को छोड़कर) उसे दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया जाएगा.
(3) उसे अपने पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार होगा.

निवारक निरोध: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 के खंड- 3, 4 ,5 तथा 6 में तत्संबंधी प्रावधानों का उल्लेख है. निवारक निरोध कानून के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को अपराध करने के पूर्व ही गिरफ्तार किया जाता है. निवारक निरोध का उद्देश्य व्यक्ति को अपराध के लिए दंड देना नहीं, बल्कि उसे अपराध करने से रोकना है. वस्तुतः यह निवारक निरोध राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था बनाए रखने या भारत संबंधी कारणों से हो सकता है. जब किसी व्यक्ति निवारक निरोध की किसी विधि के अधीन गिरफ्तार किया जाता है, तब:
(a) सरकार ऐसे व्यक्ति को केवल 3 महीने तक जेल में रख सकती है. अगर गिरफ्तार व्यक्ति को तीन महीने से अधिक समय के लिए जेल में रखना हो, तो इसके लिए सलाहकार बोर्ड का प्रतिवेदन प्राप्त करना पड़ता है.
(b) इस प्रकार निरुद्ध व्यक्ति को यथाशीघ्र निरोध के आधार पर सूचित किए जाएगा, लेकिन जिन तथ्यों को निरस्त करना लोकहित के विरुद्ध समझा जाएगा उन्हें प्रकट करना आवश्यक नहीं है.
(c) निरुद्ध व्यक्ति को निरोध आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन करने के लिए शीघ्रातिशीघ्र अवसर दिया जाना चाहिए.

निवारक निरोध से संबंधित अब तक बनाई गई विधियां:

1) निवारक निरोध अधिनियम, 1950: भारत की संसद ने 26 फरवरी, 1950 को पहला निवारक निरोध अधिनियम पारित किया था. इसका उद्देश्य राष्ट्र विरोधी तत्वों को भारत की प्रतिरक्षा के प्रतिकूल कार्य से रोकना था. इसे 1 अप्रैल, 1951 को समाप्त हो जाना था, किन्तु समय-समय पर इसका जीवनकाल बढ़ाया जाता रहा. अंततः यह 31 दिसंबर, 1971 को समाप्त हुआ.

2) आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम, 1971: 44वें सवैंधानिक संशोधन (1979) इसके प्रतिकूल था और इस कारण अप्रैल, 1979 में यह समाप्त हो गया.

3) विदेशी मुद्रा संरक्षण व तस्करी निरोध अधिनियम, 1974: पहले इसमें तस्करों के लिए नजरबंदी की अवधि 1 वर्ष थी, जिसे 13 जुलाई, 1984 ई० को एक अध्यादेश के द्वारा बढ़ाकर 2 वर्ष कर दिया गया है.

4) राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980: जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त अन्य सभी राज्यों में लागू किया गया.

5) आतंकवादी एवं विध्वंसकारी गतिविधियां निरोधक कानून (टाडा): निवारक निरोध व्यवस्था के अन्‍तर्गत अब तक जो कानून बने उन में यह सबसे अधिक प्रभावी और सर्वाधिक कठोर कानून था. 23 मई, 1995 को इसे समाप्त कर दिया गया.

6) पोटा: इसे 25 अक्टूबर, 2001 को लागू किया गया. 'पोटा' टाडा का ही एक रूप है. इसके अन्तर्गत कुल 23 आंतकवादी गुटों को प्रतिबंधित किया गया है. आंतकवादी और आंतकवादियों से संबंधित सूचना को छिपाने वालों को भी दंडित करने का प्रावधान किया गया है. पुलिस शक के आधार पर किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है, किन्तु बिना आरोप-पत्र के तीन महीने से अधिक हिरासत में नहीं रख सकती. पोटा के तहत गिरफ्तार व्यक्ति हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है, लेकिन यह अपील भी गिरफ़्तारी के तीन महीने बाद ही हो सकती है, 21 सितम्बर, 2004 को इसे अध्यादेश के द्वारा समाप्त कर दिया गया दिया गया.

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
अनुच्छेद 23: मानव के दुर्व्यापार और बलात श्रम का प्रतिषेध: इसके द्वारा किसी व्यक्ति की खरीद-बिक्री, बेगारी तथा इसी प्रकार का अन्य जबरदस्ती लिया हुआ श्रम निषिद्ध ठहराया गया है, जिसका उल्लंघन विधि के अनुसार दंडनीय अपराध है.

नोट: जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है.

अनुच्छेद 24: बालकों के नियोजन का प्रतिषेध: 14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बच्चे को कारखानों, खानों या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है.

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार-
अनुच्छेद 25: अंत:करण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता: कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को मान सकता है और उसका प्रचार-प्रसार कर सकता है.

अनुच्छेद 26: धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता: व्यक्ति को अपने धर्म के लिए संथाओं की स्थापना व पोषण करने, विधि-सम्मत सम्पत्ति के अर्जन, स्वामित्व व प्रशासन का अधिकार है.

अनुच्छेद 27: राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे कर देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है, जिसकी आय किसी विशेष धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विशेष रूप से निश्चित कर दी गई है.

अनुच्छेद 28: राज्य विधि से पूर्णतः पोषित किसी शिक्षा संस्था में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी. ऐसे शिक्षण संस्थान अपने विद्यार्थियों को किसी धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने या किसी धर्मोपदेश को बलात सुनने हेतु बाध्य नहीं कर सकते.

5. संस्कृति एवं शिक्षा संबंधित अधिकार:
अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यक हितों का संरक्षण कोई अल्पसंख्यक वर्ग अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रख सकता है और केवल भाषा, जाति, धर्म और संस्कृति के आधार पर उसे किसी भी सरकारी शैक्षिक संस्था में प्रवेश से नहीं रोका जाएगा.

अनुच्छेद 30: शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार: कोई भी अल्पसंख्यक वर्ग अपनी पसंद की शैक्षणिक संस्था चला सकता है और सरकार उसे अनुदान देने में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करेगी.

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार:
'संवैधानिक उपचारों का अधिकार' को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा है.
अनुच्छेद 32: इसके तहत मौलिक अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय में आवेदन करने का अधिकार प्रदान किया गया है. इस सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय को पांच तरह के रिट निकालने की शक्ति प्रदान की गई है जो निम्न हैं:
(a) बंदी प्रत्यक्षीकरण
(b) परमादेश
(c) प्रतिषेध लेख
(d) उत्प्रेषण
(e) अधिकार पृच्छा लेख

(1) बंदी प्रत्यक्षीकरण: यह उस व्यति की प्रार्थना पर जारी किया जाता है जो यह समझता है कि उसे अवैध रूप से बंदी बनाया गया है. इसके द्वारा न्यायालय बंदीकरण करने वाले अधिकारी को आदेश देता है कि वह बंदी बनाए गए व्यक्ति को निश्चित स्थान और निश्चित समय के अंदर उपस्थित करे जिससे न्यायालय बंदी बनाए जाने के कारणों पर विचार कर सके.
(2) परमादेश: परमादेश का लेख उस समय जारी किया जाता है, जब कोई पदाधिकारी अपने सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वाह नहीं करता है. इस प्रकार के आज्ञापत्र के आधार पर पदाधिकारी को उसके कर्तव्य का पालन करने का आदेश जारी किया जाता है.
(3) प्रतिषेध लेख: यह आज्ञापत्र सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय द्वारा निम्न न्यायालयों तथा अर्द्ध न्यायिक न्यायाधिकरणों को जारी करते हुए आदेश दिया जाता है कि इस मामले में अपने यहां कार्यवाही न करें क्यूंकि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है.
(4) उत्प्रेषण: इसके दवरा अधीनस्थ न्यायालयों को यह निर्देश दिया जाता है कि वे अपने पास लंबित मुकदमों के न्याय निर्णयन के लिए उससे वरिष्ठ न्यायालय को भेजें.
(5) अधिकार पृच्छा लेख: जब कोई व्यक्ति ऐसे पदाधिकारी के रूप में कार्य करने लगता है जिसके रूप में कार्य करने का उससे वैधानिक रूप से अधिकार नहीं है न्यायालय अधिकार-पृच्छा के आदेश के द्वारा उस व्यक्ति से पूछता है कि वह किस अधिकार से कार्य कर रहा है और जब तक वह इस बात का संतोषजनक उत्तर नहीं देता वह कार्य नहीं कर सकता है.
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Monday, 29 May 2017

कैसे बताऊँ मैं:-

कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
मेरे लिए तुम कौन हो कैसे बताऊँ
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
तुम धड़कनों का गीत हो
जीवन का तुम संगीत हो
तुम ज़िन्दगी तुम बंदगी
तुम रौशनी तुम ताज़गी
तुम हर ख़ुशी तुम प्यार हो
तुम प्रीत हो मनमीत हो
आँखों में तुम यादों में तुम
साँसों में तुम आहों में तुम
नींदों में तुम ख़्वाबों में तुम
तुम हो मेरी हर बात में
तुम हो मेरे दिन रात में
तुम सुबह में तुम श्याम में
तुम सोच में तुम काम में
मेरे लिए पाना भी तुम
मेरे लिए खोना भी तुम
मेरे लिए हंसना भी तुम
मेरे लिए रोना भी तुम
और जागना सोना भी तुम
जाऊं कहीं देखूं कहीं
तुम हो वहाँ तुम हो वहीँ
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
तुम बिन तो मैं कुछ भी नहीं
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
मेरे लिए तुम कौन हो
ये जो तुम्हारा रूप है
ये ज़िन्दगी की धुप है
चन्दन से तरशा है बदन
बहती है जिस में एक अगन
ये शोखियाँ ये मस्तियाँ
तुमको हवाओं से मिली
ज़ुल्फ़ें घटाओं से मिली
होंठों में कलियाँ खिल गयी
आँखों को झीले मिल गयी
चेहरे में सिमटी चांदनी
आवाज़ में है रागिनी
शीशे के जैसा अंग है
फूलों के जैसा रंग है
नदियों के जैसी चाल है
क्या हुस्न है क्या हाल है
ये जिस्म की रंगीनियां
जैसे हज़ारों तितलियाँ
बाहों की ये गोलाइयाँ
आँचल में ये परछाइयाँ
ये नगरियाँ है ख्वाब की
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
हालत दिल ए बेताब की
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
मेरे लिए तुम कौन हो
कैसे बताऊँ कैसे बताऊँ
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
मेरे लिए तुम धर्म हो
मेरे लिए ईमान हो
तुम ही इबादत हो मेरी
तुम ही तो चाहत हो मेरी
तुम ही मेरा अरमान हो
तख्ता हूँ मैं हर पल जिससे
तुम ही तो वो तस्वीर हो
तुम ही मेरी तक़दीर हो
तुम ही सितारा हो मेरा
तुम ही नज़ारा हो मेरा
युध्ययन में मेरे हो तुम
जैसे मुझे घेरे हो तुम
पूरब में तुम पच्छिम में तुम
उतर में तुम दक्षिण में तुम
सारे मेरे जीवन में तुम
हर पल में तुम हर चिर में तुम
मेरे लिए रास्ता भी तुम
मेरे लिए मंज़िल भी तुम
मेरे लिए सागर भी तुम
मेरे लिए साहिल भी तुम
मैं देखता बस तुमको हूँ
मैं सोचता बस तुमको हूँ
मैं जानता बस तुमको हूँ
मैं मानता बस तुमको हूँ
तुम ही मेरी पहचान हो
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
देवी हो तुम मेरे लिए
मेरे लिए भगवान् हो
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें
मेरे लिए तुम कौन हो

Thursday, 11 May 2017

वकील - एक सामाजिक अभियन्ता

वकीलों को सामाजिक अभियन्ता भी कहा जाता है। आप तो जानते ही हैं कि हमारी दिन-चर्या एवं हमारा समाज, सभी कुछ कानून से बंधा है। वकीलों का कार्य है इन कानूनों को समझना और हम सबको अपना जीवन सफल बनाने में मदद करना। अनेक वकील विपदाग्रस्त लोगों की मदद करते हैं और महिला अधिकार जैसे क्षेत्रों में अपना योगदान देते हैं। यदि आप लोगों के जीवन में एक बेहतर कल के लिए परिवर्तन लाना चाहते हैं तो विधि-शास्त्र सर्वोत्तम पथ है।

वकील समान्य एवं असामान्य स्थितियों में अपने सामान्य ज्ञान का प्रयोग कर प्रश्नों का उत्तर खोजते हैं। यदि आप होशियार एवं हाज़िर जवाब हैं, तो आप निश्चय ही सफल वकील बन सकते हैं।

संविधानिक विधि का जटिल प्रश्न हो या फिर सड़क-कानून तोड़ने जैसा सामान्य विषय, वकील सभी प्रकार की स्थितियों में अपनी बुध्दि का प्रयोग कर सवालों के जवाब ढूंढते हैं।

वकील जीवन के हर छेत्र से संबंधित लोगों के साथ कार्य करते हैं, कानून समझते एवं समझाते हैं और विधि-विषयक सिध्दान्तों का प्रयोग कर लोगों की छोटी-बड़ी परेशानियों का समाधान ढूंढते हैं। सीधे शब्दों में, एक अच्छा वकील वो है जो कि तीव्र बुध्दि है और अपने सामान्य ज्ञान की शक्ति से सामान्य एवं असामान्य परेशानियों का हल ढूंढते हैं।

Friday, 31 March 2017

लक्ष्मण रेखा एक प्रतीक :-

***रामायण में अगर कोई एक शब्द जिससे संबंधित घटनाक्रम बाद में अत्यंत संवेदनशील व महत्वपूर्ण बन गया और जिसका उपयोग कालांतर में युगों-युगों तक, मुहावरों, लोकोक्तियों, कहावतों, कहानियों, धार्मिक उपदेशों में, निरंतर हो रहा है तो वो यकीनन लक्ष्मण-रेखा शब्द ही होना चाहिए।
क्या रामायण में यह लक्ष्मण-रेखा सिर्फ माता सीता के लिए खिंची गई थी? यकीनन उद्देश्य तो जंगल में माता सीता की सुरक्षा ही थी। किसी अनजान का बाहर से भीतर प्रवेश इस रेखा के बाद वर्जित था। अर्थात यह रावण के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक थी। इस लक्ष्मण-रेखा को सिर्फ एक सुरक्षा कवच न मानते हुए अगर संकेत और प्रतीक की तरह देखा जाये, एक विचारधारा व दृष्टिकोण के रूप में लिया जाये तो कई लक्ष्मण-रेखाएं रामायण के हर चरित्र के लिए अदृश्य रूप से ही सही, मगर इस धर्म-ग्रंथ में उपस्थित है। अगर सीधे और सरल शब्दार्थ में कहना हो तो इसे एक सीमा के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है। यह सामाजिक मनुष्य के स्वतंत्रता की सीमा हो सकती है। आचरण व अधिकारों की सीमा हो सकती है। चाहत-इच्छाओं-महत्वाकांक्षाओं की सीमा हो सकती है। रिश्तों-भावों में बहने की सीमा हो सकती है। सहनशीलता से लेकर अत्याचार सहने तक की भी सीमा हो सकती है। और व्यावहारिक जीवनशैली में दिशा-निर्देशन भी हो सकती है। लक्ष्मण-रेखा तो दशरथ और कैकेयी की भी थी, जिसे लांघने का खमियाजा फिर पूरे राजवंश ने भोगा। लक्ष्मण-रेखा तो वानर राज बलि की भी थी। संक्षिप्त में कहें तो लक्ष्मण-रेखा हर एक चरित्र की है और होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ ने अपनी-अपनी लक्ष्मण-रेखाओं को सहजता, सरलता व समयानुसार स्वीकार किया तो कइयों ने इसका जाने-अनजाने ही सही उल्लंघन किया। शायद रामायण से समाज को यह संदेश तो चला ही गया कि लक्ष्मण-रेखाएं किसी को भी नहीं लांघनी चाहिए। फिर चाहे वह शक्तिशाली शिव-भक्त असुर रावण ही क्यूं न हो। मगर हम इस बृहद् भावार्थ को और इसमें छिपे हुए गहरे संदेश को न तो समझ पाते हैं न ही आत्मसात् कर पाते हैं। वैसे विभिन्न लक्ष्मण-रेखाओं को हर हाल में मानते हुए अपना कर्तव्य-पालन के कारण ही राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये।**
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