Thursday, 14 July 2016

वकीलों का काला कोट गुलामी का प्रतीक:-

हिंदुस्तान की न्याय व्यवस्था में काम करने वाले जो एडवोकेट मित्र हैं। उनसे और अपने आपसे माफ़ी मांगते हुए आप सबसे ये पूछता हूँ कि - क्या आप जानते हैं, यह काला कोट पहन के अदालत में क्यों जाते हैं? क्या काले को छोड़ के दूसरा रंग नहीं है भारत में? सफ़ेद नहीं है। नीला नहीं है। पीला नहीं है। हरा नहीं है? और कोई रंग ही नहीं है। काला ही कोट पहनना है। वो भी उस देश की न्यायपालिका में जहाँ तापमान 45 डिग्री हो। तो 45 तापमान जिस देश में रहता हो। वहाँ के वकील काला कोट पहन के बहस करें। तो बहस के समय जो पसीना आता है। वो और गर्मी के कारण जो पसीना आता है वो। तरबतर होते जायें। और उनके कोट पर पसीने से सफ़ेद सफ़ेद दाग पड़ जायें। पीछे कालर पर और कोट को उतारते ही इतनी बदबू आये कि कोई तीन मीटर दूर खिसक जाये। लेकिन फिर भी कोट का रंग नही बदलेंगे। क्योंकि ये अंग्रेजों का दिया हुआ है।
आपको मालूम है। अंग्रेजो की अदालत में काला कोट पहन के न्यायपालिका के लोग बैठा करते थे। और उनके यहाँ स्वाभाविक है । क्योंकि उनके यहाँ न्यूनतम -40 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान होता है। जो भयंकर ठण्ड है। तो इतनी ठण्ड वाली देश में काला कोट ही पहनना पड़ेगा। क्योंकि वो गर्मी देता है। ऊष्मा का अच्छा अवशोषक है। अन्दर की गर्मी को बाहर नहीं निकलने देता। और बाहर से गर्मी को खींच के अन्दर डालता है। इसीलिए ठण्ड वाले देश के लोग काला कोट पहन के अदालत में बहस करें। तो समझ में आता है। पर हिंदुस्तान के गरम देश के लोग काला कोट पहन के बहस करें। 1947 के पहले होता था। समझ में आता है। पर 1947 के बाद भी चल रहा है? हमारी बार काउन्सिल को इतनी समझ नहीं है क्या? कि इस छोटी सी बात को ठीक कर लें। बदल लें। सुप्रीम कोर्ट की बार एसोसिएशन है। हाईकोर्ट की बार एसोसिएशन है। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की बार एसोसिएशन है। सभी बार एसोसिएशन व बार काउन्सिल अॉफ इंडिया मिल के एक मिनट में फैसला कर सकते हैं कि कल से हम ये काला कोर्ट नहीं पहनेंगे।
हमारे देश पहले अंग्रेज न्यायाधीश हुआ करते थे, तो सर पर टोपा पहन के बैठते थे। जिसमें नकली बाल होते थे। आज़ादी के बाद 40-50 साल तक टोपा लगा कर यहाँ बहुत सारे जज बैठते रहे, देश की अदालत में।
अभी यहाँ क्या विचित्रता है कि काला कोट पहन लिया। ऊपर से काला पेंट पहन लिया। बो लगा लिया। सब एकदम टाइट कर दिया। हवा अन्दर बिलकुल न जाये। फिर मांग करते है कि सभी कोर्ट में एयर कंडीशनर होना चाहिए। ये कोट उतार के फेंक दो न। एयर कंडीशन की जरुरत क्या है? और उसके ऊपर एक गाउन और लाद लेते हैं। वो नीचे तक लहंगा फैलता हुआ। ऐसी विचित्रताएं इस देश में आज़ादी के 70 साल होने को हैं इसके बाद भी वकीलों का काला कोट चल व दिखाई दे रहा है।
अंग्रेजों की गुलामी की एक भी निशानी को आज़ादी के 68 साल में हमने मिटाया नहीं। सबको संभाल के रखा है।
#AdvAnshuman

Sunday, 10 July 2016

ढ़ाई आखर प्रेम का :: डॉ. जाकिर नायक

विगत दो दिनों में तथाकथित धर्मगुरु डॉ. जाकिर नायक के youtube video देखा, सुना व समझा तो महसूस हुआ कि डॉ. साहब हर चीज़ का reference देते हैं... कुरान का फला पृष्ठ, वेद का फला पृष्ठ, बाइबल का फला पृष्ठ.. आदि आदि।
और तो और सारी तकरीरें/भाषण अंग्रेजी भाषा में... क्या देश का मुसलमान इतना शिक्षित हो चुका है..???
हमारे लाखों गरीब मुसलमान भाइयों का क्या...??? पहले वे अंग्रेजी सीखे तब ना, डॉ. साहब समझ में आयेंगें।
इन सब पर मेरे प्यारे फकीर "कबीर" ने बहुत पहले कह दिया था, जो डॉ. जाकिर नायक को श्रद्धा पूर्वक स्वरुप समर्पित है...
"पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय॥"
#AdvAnshuman
#भारतमेराधर्म

Sunday, 26 June 2016

अधिवक्ता पेंशन व युवा अधिवक्ता भत्ता... आंदोलन एक यात्रा:-

अधिवक्ता पेंशन कल्याणकारी योजना के लिये निरन्तर आंदोलन करते रहना है। हम अधिवक्ता बंधुओं को अगर अच्छी योजना बनाकर दिया जायेगा तो हम व्यक्तिगत अंशदान को भी तैयार हैं। 2009 में जब यह आंदोलन शुरु हुआ तो न बार एसोसिएशन साथ मे था और ना बार काउंसिल। फिर 2010 में बनारस बार और फिर सेन्ट्रल बार साथ में आया। पेंशन उपसमिति बनी। उत्तर प्रदेश अधिवक्ता पेंशन (कल्याणकारी) योजना नियम, 2010 का प्रारूप बना और तत्कालीन प्रदेश सरकार व बार काउंसिल को भेजा गया। पर कुछ न हुआ 2012 विधानसभा चुनाव व बार काउंसिल चुनाव आया। समाजवादी पार्टी व भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में अधिवक्ता पेंशन व युवा अधिवक्ता भत्ता सम्मिलित कर लिया। यह देख काफी बार काउंसिल व बार एसोसिएशन के प्रत्याशियों ने भी अधिवक्ता पेंशन व युवा अधिवक्ता भत्ता का वादा किया। यह हमारी मांग की मौलिक विजय थी। चुनाव के पश्चात स.पा. सरकार व उसके मुख्यमंत्री व मंत्रियों ने वकीलों के हर सम्मेलनों में व गोष्ठी में अधिवक्ता पेंशन व युवा अधिवक्ता भत्ता की बात दोहराई है पर 5 (पाँच) साल होने को आये किया कुछ नहीं।
अधिवक्ता पेंशन योजना व युवा अधिवक्ता भत्ता योजना की हमारी मांग को बार काउंसिल अॉफ इंडिया ने अपने नये नियम BCI Certificate and Place of Practice (Verification) Rules, 2015 में भी अंकित कर अन्तिम रुप दे दिया है।
#AdvAnshuman
 

Monday, 20 June 2016

BCI Verification Rules ~Vs.~ BCUP

निम्न स्तर की व्यवस्था में बिना सही नियोजन के उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने 10.06.2016 तक 70000+ अधिवक्ता बंधुओं के वेरिफिकेशन फार्म जमा करा लिये हैं।

अब देखना यह होगा कि इन फार्मों की जांच के उपरांत कब तक Certificate of Practice (COP) तथा वैधता तिथि के साथ वाला Identity Card कब तक मिलता है...???

यहां यह भी देखने योग्य होगा कि जिन अधिवक्ता बंधुओं ने वेरिफिकेशन फार्म नहीं भरा है, उनका क्या होता है...???

वेरिफिकेशन फार्म भरकर अधिवक्ता बंधुओं ने गेंद अब बार काउंसिल अॉफ इंडिया तथा बार काउंसिल अॉफ उत्तर प्रदेश के पाले में डाल दी हैं, अब देखना है कि बड़े-बड़े दावे करने वाले अब क्या-क्या करते हैं...???

वैसे यह कहने में कोई कष्ट नहीं है कि जिस तरीके से वेरिफिकेशन फार्म भरें व भरवायें गये हैं वह कहीं से भी स्तरीय नहीं था और यह खेद का विषय है।

बार काउंसिल का अधिवक्ताओं प्रति रवैया सही नहीं था। अॉनलाइन के युग में बाबा आदम के जमाने का तरीका, जहां एक पृष्ट के अॉनलाइन फार्म से काम चल सकता था वहां बिना बात के 11 पृष्ठ का फार्म manually भरवाया गया।
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Sunday, 5 June 2016

न्यायपालिका:-

पूरी न्यायिक प्रणाली के शीर्ष पर हमारा उच्चतम न्यायालय है। हर राज्य या कुछ राज्यों के समूह पर उच्च न्यायालय है। उनके अंतर्गत निचली अदालतों का एक समूचा तंत्र है। कुछ राज्यों में पंचायत न्यायालय अलग-अलग नामों से काम करते हैं, जैसे न्याय पंचायत, पंचायत अदालत, ग्राम कचहरी इत्यादि। इनका काम छोटे और मामूली प्रकार के स्थानीय दीवानी और आपराधिक मामलों का निर्णय करना है। राज्य के अलग-अलग कानून इन अदालतों का कार्यक्षेत्र निर्धारित करते हैं।

प्रत्येक राज्य न्यायिक जिलों में विभाजित है। इनका प्रमुख जिला एवं सत्र न्यायाधीश होता है। जिला एवं सत्र न्यायालय उस क्षेत्र की सबसे बड़ी अदालत होती है और सभी मामलों की सुनवाई करने में सक्षम होती है, उन मामलों में भी जिनमें मौत की सजा तक सुनाई जा सकती है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश जिले का सबसे बड़ा न्यायिक अधिकारी होता है। उसके तहत दीवानी क्षेत्र की अदालतें होती हैं जिन्हें अलग-अलग राज्यों में मुंसिफ, उप न्यायाधीश, दीवानी न्यायाधीश आदि नाम दिए जाते हैं। इसी तरह आपराधिक प्रकृति के मामलों के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और प्रथम तथा द्वितीय श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट आदि होते हैं।
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कानूनी व्यवसाय:-

देश के कानूनी व्यवसाय से संबंधित कानून अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और देश की बार काउंसिल द्वारा निर्धारित नियमों के आधार पर संचालित होता है। कानून के क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों के लिए यह स्वनिर्धारित कानूनी संहिता है जिसके तहत देश और राज्यों की बार काउंसिल का गठन होता है। अधिवक्ता कानून, 1961 के तहत पंजीकृत किसी भी वकील को देश भर में कानूनी व्यवसाय करने का अधिकार है। किसी राज्य की बार काउंसिल में पंजीकृत कोई वकील किसी दूसरे राज्य की बार काउंसिल में अपने नाम के तबादले के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार आवेदन कर सकता है। कोई भी वकील एक या ज्यादा राज्य की बार काउंसिल में पंजीकृत नहीं हो सकता है। अधिवक्ताओं की दो श्रेणियां हैं जिनमें से एक को वरिष्ठ अधिवक्ता और शेष को अधिवक्ता कहा जाता है। यदि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय का यह मत है कि कोई अधिवक्ता अपनी योग्यता अदालत में अपनी स्थिति, विशेष जानकारी या कानूनी अनुभव के आधार पर वरिष्ठ अधिवक्ता बनने का अधिकारी है तो उसे उसकी सहमति से वरिष्ठ अधिवक्ता बनाया जा सकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता किसी अन्य अधिवक्ता के बगैर उच्चतम न्यायालय में पेश नहीं हो सकता। दूसरे अधिवक्ता का नाम रिकॉर्ड में होना चाहिए। इसी तरह अन्य अदालतों और न्यायाधिकरणों में पेश होने के लिए सहयोगी अधिवक्ता का नाम राज्य सूची में दर्ज होना चाहिए। अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण के लिए शिक्षा का स्तर निर्धारित है। व्यावसायिक आचरण और व्यवहार पर नियंत्रण के साथ-साथ अन्य मामलों के लिए नियम बनाए गए हैं। राज्य की बार काउंसिलों के पास अपने यहां पंजीकृत वकीलों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही का अधिकार होता है। इस कार्यवाही के विरुद्ध देश की बार काउंसिल में अपील की जा सकती है और उच्चतम न्यायालय में भी जाने का अधिकार मिला हुआ है।
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अधिवक्ता कल्याण कोष:-

कनिष्ठ वकीलों को वित्तीय सहायता मुहैया कराकर उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना और दरिद्र एवं विकलांग वकीलों के लिए कल्याण कार्यक्रम चलाना कानूनी बिरादरी के लिए सदैव महत्वपूर्ण रहा है। कई राज्यों ने इस विषय पर अपने अलग विधान बनाए हैं। संसद में ‘अधिवक्ता कल्याण कोष कानून, 2001’ पारित किया है। यह कानून उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश के लिए मान्य् है जहां इस विषय पर कोई कानून नहीं बना है। इस कानून का उद्देश्य है कि संबंधित सरकार ‘अधिवक्ता कल्याण कोष’ का गठन करे। इस कानून में यह अनिवार्य है कि हर वकील किसी भी न्यायालय, न्यायाधिकरण और प्राधिकार में वकालतनामा दाखिल करने के लिए निश्चित मूल्य के टिकट लगाए। ‘अधिवक्ता कल्याण कोष टिकट’ से जुटाई गई राशि अधिवक्ता कल्याण कोष का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

सभी वकील आवेदन राशि और वार्षिक चंदा देकर अधिवक्ता कल्याण कोष के सदस्य बन जाते हैं। इस कोष का संचालन संबद्ध सरकार द्वारा गठित ट्रस्टी करती है। सदस्य को गंभीर स्वास्थ्य समस्या होने पर इस कोष से अनुदान राशि दी जाती है या वकील की प्रैक्टिस बंद हो जाने पर एक निश्चित राशि का भुगतान किया जाता है। वकील की मौत हो जाने पर उसके कानूनी उत्तराधिकारी को भी राशि देने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त सदस्यों और उसके आश्रितों को चिकित्सा और शैक्षणिक सुविधा मुहैय्या कराने और वकीलों को पुस्तक खरीदने तथा समान सुविधाएं प्रदान करने के लिए भी राशि देने का प्रावधान है।
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Sunday, 22 May 2016

वकालत के साथ आजीविका के लिए अन्य कार्य व्यवसायिक दुराचरण:-

बार कौंसिल ऑफ इंडिया रूल्स के पार्ट IV के चैप्टर II के सैक्शन 7 नियम 47-52 में एक एडवोकेट पर अन्य व्यवसायिक गतिविधियाँ करने पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए हैं, ये निम्न प्रकार हैं –

Section VII-Restriction on other Employments

47. An advocate shall not personally engage in any business; but he may be a sleeping partner in a firm doing business provided that in the opinion of the appropriate State Bar Council, the nature of the business is not inconsistent with the dignity of the profession.

48. An advocate may be Director or Chairman of the Board of Directors of a company with or without any ordinarily sitting fee, provided none of his duties are of an executive character. An advocate shall not be a Managing Director or a Secretary of any company.

49. An advocate shall not be a full-time salaried employee of any person, government, firm, corporation or concern, so long as he continues to practise, and shall, on taking up any such employment, intimate the fact to the Bar Council on whose roll his name appears and shall thereupon cease to practise as an advocate so long as he continues in such employment.

Nothing in this rule shall apply to a Law Officer of the Central Government of a State or of any Public Corporation or body constituted by statute who is entitled to be enrolled under the rules of his State Bar Council made under Section 28 (2) (d) read with Section 24 (1) (e) of the Act despite his being a full time salaried employee.

Law Officer for the purpose of these Rules means a person who is so designated by the terms of his appointment and who, by the said terms, is required to act and/or plead in Courts on behalf of his employer.

50. An advocate who has inherited, or succeeded by survivorship to a family business may continue it, but may not personally participate in the management thereof. He may continue to hold a share with others in any business which has decended to him by survivorship or inheritance or by will, provided he does not personally participate in the management thereof.

51. An advocate may review Parliamentary Bills for a remuneration, edit legal text books at a salary, do press-vetting for newspapers, coach pupils for legal examination, set and examine question papers; and subject to the rules against advertising and full-time employment, engage in broadcasting, journalism, lecturing and teaching subjects, both legal and non-legal.

52. Nothing in these rules shall prevent an advocate from accepting after obtaining the consent of the State Bar Council, part-time employment provided that in the opinion of the State Bar Council, the nature of the employment does not conflict with his professional work and is not inconsistent with the dignity of the profession. This rule shall be subject to such directives if any as may be issued by the Bar Council India from time to time.

नियम 47- के अनुसार एक एडवोकेट किसी व्यवसाय में सीधे स्वयं लिप्त नहीं हो सकता किन्तु वह ऐसे व्यवसाय में मौन साझीदार हो सकता है जो राज्य बार कौंसिल की राय में एडवोकेट के पेशे की गरिमा के प्रतिकूल न हो।

नियम 48- के अनुसार एक एडवोकेट एक सामान्य बैठक शुल्क सहित निःशुल्क कंपनी का निदेशक या निदेशक मंडल का प्रधान हो सकता है, किन्तु उस के कर्तव्य कार्यकारी प्रकार के नहीं होने चाहिए। वह किसी कंपनी का प्रबंध निदेशक अथवा सचिव नहीं हो सकता है।

नियम 49- के अनुसार कोई भी एडवोकेट किसी व्यक्ति, सरकार, फर्म, निगम या संस्थान का पूर्णकालिक वैतनिक कर्मचारी नहीं हो सकता। जब तक वह एडवोकेट का पेशा करे यदि वह इस तरह का कोई कार्य करना चाहता है तो उसे उस राज्य के बार कौंसिल जिस में उस का नाम दर्ज है सूचित करना चाहिए और तब तक एडवोकेट का पेशा रोक देना चहिए जब तक वह ऐसे नियोजन में रहे। लेकिन यह नियम केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, सार्वजनिक निगमों और विधि द्वारा निर्मित निकायों के विधिक सलाहकारों पर प्रभावी नहीं है जिन्हें राज्य बार कौंसिल द्वारा उन के नियमों के तहत छूट प्रदान की गई है।

नियम 50- के अनुसार यदि किसी एडवोकेट को उत्तराधिकार में या उत्तरजीविता में कोई पारिवारिक व्यवसाय प्राप्त हुआ हो या किसी के अन्य के साथ व्यवसाय में भागीदारी प्राप्त हुई हो तो वह उसे जारी रख सकता है,  लेकिन वह उस के प्रबंधन में व्यक्तिगत रूप से भाग नहीं लेगा।

नियम 51- के अनुसार एक एडवोकेट शुल्क के लिए संवैधानिक विधेयकों का पुनर्विलोकन कर सकता है, वेतन प्राप्त कर के कानूनी पाठ्य पुस्तकों का संपादन कर सकता है, समाचार पत्रों के लिए प्रेस पुनरीक्षण कर सकता है, विधिक परीक्षा के लिए छात्रों को कोचिंग दे सकता है, परीक्षा के प्रश्नपत्र बना सकता है और उत्तर पुस्तिकाएँ जाँच सकता है और विज्ञापन व पूर्णकालिक नियोजनों के लिए बनाए गए नियमों के अंतर्गत प्रसारण, पत्रकारिता तथा विधि व अन्य विषयों का अध्यापन कर सकता है।

नियम 52- के अनुसार बार कौंसिल की अनुमति से अंशकालिक नियोजन स्वीकार कर सकता है।

यदि आप के आजीविका हेतु किए गए अन्य कार्य उक्त प्रतिबंधित श्रेणी में नहीं हैं और अनुमत श्रेणी के अंतर्गत हैं तो आप एक एडवोकेट के रूप में वकालत का व्यवसाय कर सकते हैं।
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Sunday, 15 May 2016

Bar Council of India to Filter Lawyers with Mandatory Certificate of Practice

Now, a law degree and enrolment with respective state Bar Councils will not be enough to be a practising lawyer. Wary of the tendency of law graduates to switch careers after being enrolled, the Bar Council of India (BCI) has introduced a new rule mandating a certificate of practice for advocates i.e. BCI Certificate and Place of Practice (Verification) Rules, 2015.

The BCI, at a joint meeting of the representatives of all state bar councils, had  expressed concern over the growing exodus of lawyers, many of them who shift to other jobs without informing the professional body.

An Advocate would not be entitled to practice law unless he holds a valid certificate of practice issued either under BCI All India Bar Examination Rules or the newly amended BCI Certificate and Place of Practice (Verification) Rules, 2015.

The Certificate of Practice has to be renewed once every five years. According to the BCI, the legal profession is slipping out of the hands of practising advocates. The various welfare schemes floated for practising advocates are enjoyed by those who have left the practice.

It would improve the standards of legal profession. The lawyers, who fail to obtain the certificate of practice, will be included in the list of defaulting advocates to be published under the title of non-practising advocates. A person included in the list will be barred from appearing in courts and tribunals. Such a prohibition will be continued till resumption of practice, by filing application with prescribed fee. New rules also constitute a practice fund for improving the facilities in Bar Associations.

BCI Certificate and Place of Practice (Verification) Rules, 2015